हाईकोर्ट पहुंचा बोरवेल में गिरे फतेहवीर 2 साल के बच्चे की मौत का मामला, 17 जून को सुनवाई

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हाईकोर्ट पहुंचा बोरवेल में गिरे 2 साल के बच्चे की मौत का मामला, 17 जून को हो सकती है सुनवाई the newsroom now
  • 6 जून को शाम करीब पौने 4 बजे खेलते-खेलते पास ही 9 इंच चौड़े बोरवेल में जा गिरा था नन्हा फतेहवीर
  • लगभग 110 घंटे बाद निकाला जा सका और तब तक उसकी मौत हो चुकी थी
  • सीनियर वकील परमिंदर सिंह सेखों ने लगाई पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका
    हाईकोर्ट पहुंचा बोरवेल में गिरे फतेहवीर 2 साल के बच्चे की मौत का मामला, 17 जून को सुनवाई

    हाईकोर्ट पहुंचा बोरवेल में गिरे फतेहवीर 2 साल के बच्चे की मौत का मामला, 17 जून को सुनवाई the newsroom now

पंजाब के संरूर जिले में बोरवेल में गिरने से 2 साल के बच्चे की मौत का मामला अब पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में पहुंच गया है। इस संबंध में वकील परमिंदर सिंह सेखों ने याचिका लगाई है। उनकी मांग है कि इस तरह के मामलों को लेकर सरकार और स्थानीय प्रशासन को गाइडलाइन्स जारी की जाए। संभावना जताई जा रही है कि 17 जून (सोमवार) को सेखों की इस याचिका पर सुनवाई हो सकती है।

मौत से एक दिन पहले जन्मदिन था फतेहवीर का

फतेहवीर, सुखविंदर की इकलौती संतान है। सुखविंदर सिंह उर्फ लवीश और गगनदीप कौर की शादी करीब 7 साल पहले हुई थी। पांच साल की मन्नतों के बाद जन्मा फतेहवीर सिंह 10 जून को 2 साल का हो जाता, लेकिन इससे पहले 6 जून गुरुवार की शाम करीब पौने 4 बजे फतेहवीर खेलते-खेलते पास ही स्थित 9 इंच चौड़े और 150 फीट गहरे बोरवेल में जा गिरा। मां गगनदीप कौर के मुताबिक पास ही गाड़ी धो रहे पिता लवीश की नजर उस पर पड़ गई थी और उसने बच्चे को पकड़ने की कोशिश भी की, लेकिन पाइप पर ढके प्लास्टिक के जिस कट्‌टे पर बच्चे का पैर पड़ा था, उसका महज एक छोटा सा टुकड़ा ही हाथ में आया। उसे लगभग 110 घंटे बाद निकाला जा सका और तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। लोगों का आरोप है कि फतेहवीर की मौत प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन की लापरवाही की वजह से हुई है। इसको लेकर दो दिन से बाजार तक बंद हैं।

इस तरह रही लापरवाही

  • ऑपरेशन से पहले ‘क्विक प्रायर सर्वे’ होता है, जिसमें घटनास्थल व अंदर फंसे शख्स से जुड़ी जानकारी जुटाई जाती है। इसी सर्वे पर पूरा ऑपरेशन प्लान होता है। यहां खुदाई करने वालाें काे पता नहीं था कि बोर वर्टिकल ही है? कहीं थाेड़ा-बहुत टेढ़ा तो नहीं। इसी कारण सुरंग गलत खोदी गई।
  • एनडीआरएफ, जिला प्रशासन के पास सिविल इंजीनियरिंग में एक्सपर्ट व 100 फीट से ज्यादा गहरी खुदाई के बारे में बताने वाला माइनिंग इंजीनियर नहीं था।
  • मशीनरी की बजाय मैन्युअल तरीके पर भरोसा किया। उन्नत तकनीकों के बावजूद समानांतर बाेर की मिट्टी निकालने को लगाया रस्सा तक हाथ से खींचा गया। सरकार कारसेवा करने वालाें पर निर्भर रही।
  • जिस बाेर में बच्चा गिरा, वक्त बर्बाद करते हुए उसके चारों तरफ 20 फीट तक का सारा हिस्सा खोदा, इसकी जरूरत नहीं थी। टीम में नेतृत्व औैर विल पावर नहीं थी। कभी एनडीआरएफ, कभी डेराप्रेमी, कभी जिला प्रशासन ताे कभी सेना के हिसाब से ऑपरेशन चलाया गया।

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